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01 बाल केन्द्रित शिक्षा ( Child Centered Education )

बाल केन्द्रित शिक्षा ( Child Centered Education )

जैसा कि हमने पढ़ा है कि प्राचीन काल में शिक्षा का जो स्वरूप था और वर्तमान में शिक्षा का जो स्वरूप हम देखते है । उन दोनो में बहुत अन्तर है । बाल – केन्द्रित  शिक्षा की आवधारणा को जानने से पूर्व हमे शिक्षा की आवधारणा को जानना होगा क्योकि यह जाने बिना हम शिक्षा के स्वरूप को समझ नहीं पाएंगे। अतः पहले शिक्षा के अर्थ पर चर्चा करते है ।

शिक्षा का अर्थ ( Meaning of education ) : शिक्षा अंग्रेजी शब्द एजुकेशन ( Education ) का हिन्दी रूपान्तर है जिसकी उत्पति लेटिन शब्द ऐजूकेटम ( Educatum ) से हुई है जिसका अर्थ है शिक्षण की कला इसी के समानान्तर एक ओर शब्द है एडूकेयर ( Educare ) जिसका अर्थ है शिक्षित करना पालन पोषण करना, सामने लाना, नेतृत्व प्रदान कना । ये सभी अर्थ शिक्षा की क्रिया एवं प्रक्रिया की ओर सकेंत करते है ।

जाँन डीवी के अनुसार शिक्षा व्यक्ति की उन सभी योग्यताओं का विकास है जिनके द्वारा वह अपने वातावरण पर नियन्त्रण करने की क्षमता प्राप्त करता है और अपनी सम्भावानाओ को पूर्ण करता है ”

प्रसिद्ध दार्शनिक  पेस्टालाँजी के अनुसार,” शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शकितयो का स्वाभाविक संतुलित व प्रगतिशील विकास है । ” महात्मा गाँधी जी के शब्दो में “ शिक्षा उन र्सवश्रेष्ठ गुणों को विकसित करती है जो मानव के व बालक के शरीर , माष्तिक और आत्मा में विघमान होते है । “

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शिक्षा व्यवहार में संशोधन करती है । यह बालक के व्यवहार में ऐसे परिवर्तन लाती है। जो बालक के जीवन में उचित होते है । अगर  हम प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली की बात करे तो बालक के मन में ज्ञान की साम्रगी को ठूँस देना ही शिक्षा होती थी । बालक को इस साम्रगी को याद करने के लिए कह दिया जाता था । वह कुध सिद्धांतो व नियमो को स्मरण कर लेता था ।

कालसनिक  के अनुसार “ शिक्षा मानव व्यवहार की शक्तियो तथा निहित योग्यताओं का विकास है “

उपरोक्त परिभाषाओ के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शिक्षा व्यवहार में संशोधन करती है । यह बालक के शरीर , मष्तिक और आत्मा में विद्यमान होते है । “

उपरोक्त पारषिभाषाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शिक्षा व्यवहार में संशोधन करती है । यह बालक के व्यवहार में ऐसे परिवर्तन लाती है । जो बालक के जीवन में उचित होते है । अगर हम प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली की बात करे तो बालक के मन में ज्ञान की साम्रगी को ठूँस देना ही शिक्षा होती थी । बालक को इस साम्रगी को याद करने के लिए कह दिया जाता था । वह कुध सिद्धांतो व नियमो को स्मरण कर लेता था ।

कालकसनिक के अनुसार “ शिक्षा मानव व्यवहार की शक्तियो तथा निहित योग्यताओं का विकास है “

उपरोक्त परिभाषाओ के आधार पर शिक्षा की कुछ विशेषताओ का पाता चलता है । जो निम्न प्रकार से है ।

  1. मनुष्य में अपने मूल प्रवृत्तियाँ होती है ।
  2. शिक्षा इन्ही मूल प्रवृत्तियाँ की ,अभिवृतियो की प्रक्रिया में संशोधन काती है ।
  3. शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य अपने वातावरण में संयोजन करने का प्रयास करता है ।
  4. शिक्षा नियात्रित वातावरण में मानव विकास की एक व्यापक व निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है ।
  5. शिक्षा स्वस्थ शरीर मे स्वस्थ मन का विकास होती है ।
  6. शिक्षा की उत्पत्ति शिक्ष धातु से हुई है जिसका अर्थ है ज्ञान अर्जित  । तथा
  7. शिक्षा का अर्थ ज्ञान के अर्जन द्वारा संस्कारो का निर्माण करना है ।
February 15, 2018

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